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Republic Day 2026: संविधान निर्माण में महिलाओं की ऐतिहासिक भूमिका, ये हैं गणतंत्र की असली नायिकाएं

Republic Day 2026: भारत एक गणतांत्रिक राष्ट्र सिर्फ एक दिन की घोषणा से नही बना, बल्कि सदियों की पीड़ा, संघर्ष, विचार और अध्ययन के बाद भारत के संविधान का निर्माण हुआ। जब संविधान सभा की बैठके होतीं तो वहां केवल पुरुषों की आवाज नहीं गूंजती, बल्किन कुछ स्त्रियां भी होतीं जो समाज के एक बड़े और अहम वर्ग यानी महिलाओं के पक्ष को मजबूती बनातीं। अगर ये महिलाएं न होतीं तो आज का भारतीय लोकतंत्र वैसा न होता, जैसा हम जानते है।

संविधान केवल कानूनों का दस्तावेज नहीं है। यह उस दौर की नैतिक घोषणा थी कि भारत किसी एक वर्ग, जाति या लिंग का नहीं होगा। इन महिलाओं ने सुनिश्चित किया कि गणतंत्र की नींव न्याय, समानता और मानवीय गरिमा पर रखी जाए। संविधान सभा में 15 महिलाएं शामिल थी। गणतंत्र दिवस 2026 के मौके पर उन महिलाओं को याद करें, जिन्होंने संविधान निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई।

हंसा मेहता

हंसा मेहता सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी नहीं थीं, बल्कि संविधान सभा में महिलाओं की गरिमा की प्रहरी थीं। उन्होंने यह सुनिश्चित कराया कि संविधान में लैंगिक समानता केवल शब्द न रहे, बल्कि सिद्धांत बने। महिलाओं को मतदान, शिक्षा और समान अधिकार दिलाने में उनकी भूमिका निर्णायक रही। वह संविधान निर्माण में समानता की सबसे बुलंद आवाज बनीं।

राजकुमारी अमृत कौर

राजकुमारी अमृत कौर ने स्वास्थ्य और मानव गरिमा की संवैधानिक नींव रखी थी।संविधान सभा की प्रतिष्ठित सदस्यों में शामिल राजकुमारी अमृत कौर ने स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार के रूप में देखने की सोच को आगे बढ़ाया। उन्होंने सामाजिक न्याय, महिला कल्याण और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रावधानों को मजबूती दी। आज भारत का स्वास्थ्य ढांचा कहीं न कहीं उनके विचारों की विरासत है।

दाक्षायणी वेलायुधन

यह दलित महिला की निर्भीक आवाज बनीं। दाक्षायणी वेलायुधन संविधान सभा की इकलौती दलित महिला सदस्य थीं। उन्होंने जातिगत भेदभाव पर सीधा प्रहार किया और यह स्पष्ट किया कि सामाजिक समानता बिना आर्थिक और शैक्षणिक न्याय के संभव नहीं। उनकी भाषण शैली शालीन थी, लेकिन विचार आग जैसे थे।

बेगम ऐज़ाज़ रसूल

बेगम  ऐजाज रसूल सधर्मनिरपेक्ष भारत की पैरोकार रहीं। जब देश विभाजन के दर्द से गुजर रहा था, तब बेगम ऐज़ाज रसूल ने संविधान सभा में धर्मनिरपेक्षता की मजबूती से पैरवी की। उन्होंने अल्पसंख्यकों के अधिकारों को विशेष संरक्षण से अधिक, समान नागरिकता के सिद्धांत पर टिकाने की बात कही।

सरोजिनी नायडू की विरासत

सरोजिनी नायडू संविधान सभा की स्थायी सदस्य नहीं थीं, लेकिन उनके विचार, भाषण और महिला अधिकारों पर संघर्ष ने संविधान निर्माताओं को गहराई से प्रभावित किया। वे उस चेतना की प्रतिनिधि थीं, जिसने भारत को सिर्फ आज़ाद नहीं, बल्कि संवेदनशील लोकतंत्र बनाने की प्रेरणा दी।

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