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Thursday, October 22, 2026
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Indus Waters Treaty: भारत का बड़ा फैसला, मौजूदा स्वरूप में दोबारा लागू नहीं होगी सिंधु जल संधि

Indus Waters Treaty: सिंधु जल संधि को लेकर सीमा पार से बढ़ते शोर-शराबे के बीच भारत ने अपना रुख कड़ा कर लिया है। केंद्र सरकार के आला सूत्रों के अनुसार, सिंधु जल संधि अपने मौजूदा स्वरूप में अब दोबारा लागू नहीं होगी। 1960 की सिंधु जल संधि प्रभावी रूप से समाप्त हो चुकी है। सूत्रों का कहना है कि सिंधु जल संधि 1950 के दशक की परिस्थितियों और तकनीक पर आधारित थी, जो आज के समय के अनुरूप नहीं है। यह संधि आपसी सद्भावना के आधार पर बनी थी, आतंकवाद जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर नहीं।

“50% पानी अरब सागर में बह जाता है”

सरकारी सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान ने पिछले छह दशकों में एक भी नया बड़ा बांध नहीं बनाया। पाकिस्तान अपने हिस्से के मौजूदा जल संसाधनों का भी समुचित प्रबंधन नहीं कर पा रहा है। पाकिस्तान के हिस्से के बहाव वाले पानी का केवल 10% ही संग्रहित किया जाता है, जबकि लगभग 50% पानी अरब सागर में बह जाता है। भारत की हर जल परियोजना पर पाकिस्तान की आपत्तियों का उद्देश्य केवल उन्हें धीमा करना रहा है। उन्होंने बताया कि कश्मीर के लिए लाभकारी साबित होने वाली तुलबुल परियोजना भी पाकिस्तान की आपत्तियों के कारण स्थगित करनी पड़ी। भारत अब नई जल परियोजनाओं में तेजी लाएगा और इसके लिए विभिन्न स्थानों पर सर्वेक्षण किए जा रहे हैं। पाकिस्तान में प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लगातार भारत विरोधी बयान दे रहे हैं। आतंकवाद पर रोक लगाने के लिए पाकिस्तान की ओर से कोई विश्वसनीय और ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।

भारत का कड़ा फैसला, पाकिस्तान में बौखलाहट

अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए कायराना आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने कड़ा एक्शन लेते हुए 1960 की सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया था। भारत की कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने पाकिस्तान को सीधा संदेश दिया कि आतंकवाद और द्विपक्षीय संधियों का लाभ एक साथ नहीं चल सकता यानी “रक्त और पानी एक साथ नहीं बहेंगे”। इस ऐतिहासिक फैसले के तहत भारत ने नदियों के पानी का डेटा शेयरिंग, सालाना बैठकें, परियोजनाओं का आपसी निरीक्षण और अंतरराष्ट्रीय अदालती कार्यवाहियों में हिस्सा लेना पूरी तरह बंद कर दिया। साथ ही, जम्मू-कश्मीर में किशनगंगा और रतले जैसे जल-विद्युत प्रोजेक्ट्स का काम तेजी से बढ़ा दिया गया, जिन पर पाकिस्तान सालों से अड़ंगे लगा रहा था।

भारत के इस फैसले से पाकिस्तान में हड़कंप और खौफ का माहौल बन गया है, क्योंकि उसकी लगभग 80% खेती और पेयजल आपूर्ति भारत से होकर बहने वाली इन्हीं पश्चिमी नदियों पर निर्भर है। पहले से ही गंभीर आर्थिक कंगाली, महंगाई और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे पाकिस्तान को डर है कि संधि की कानूनी बाध्यताओं से परे हटकर अगर भारत ने बांधों के निर्माण में तेजी लाई या पानी का बहाव नियंत्रित किया, तो उसके यहां भुखमरी और सूखे के हालात बन जाएंगे। पाकिस्तान का भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घेरने का पैंतरा भी पूरी तरह विफल हो चुका है, क्योंकि भारत ने साफ कर दिया है कि जब तक सीमा पार से आतंकवाद पर पूरी तरह और स्थायी रूप से रोक नहीं लगती, तब तक यह संधि बहाल नहीं होगी।

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