नवरात्रि का संदेश: संस्कार, संकल्प और राष्ट्रनिर्माण में युवा शक्ति की निर्णायक
आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज के प्रचार प्रसार प्रभारी धार्मिक मामलों के विशेषज्ञ शान्तनु शुक्ल ने कहा जब मंदिरों की घंटियाँ गूँजती हैं, माँ दुर्गा के जयकारों से वातावरण भक्तिमय होता है और युवा पीढ़ी श्रद्धा के साथ अपनी संस्कृति से जुड़ती है, तब विश्वास जागता है कि आधुनिकता की तेज रफ्तार में भी भारत की सांस्कृतिक जड़ें जीवंत हैं उन्होंने कहा कि नवरात्रि केवल पूजा-अर्चना का पर्व नहीं, बल्कि अपनी विरासत, संस्कारों और आध्यात्मिक चेतना को आत्मसात करने का अवसर है।
प्रयागराज महाकुंभ-2025 की विराट आस्था और अयोध्या स्थित श्रीराम मंदिर के प्रति देशभर में दिखाई देने वाला भावनात्मक जुड़ाव भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ों को रेखांकित करता है। आज का युवा आधुनिक शिक्षा, तकनीक और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के साथ अपनी परंपराओं को समझने तथा आध्यात्मिक विचारों से जुड़ने के नए रास्ते भी तलाश रहा है।
माँ दुर्गा की आराधना हमें सिखाती है कि शक्ति का अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस, निर्बलों की रक्षा और पीड़ितों के प्रति करुणा भी है। देवी के चरणों में शीश झुकाने की सार्थकता तभी है, जब हमारे आचरण में महिलाओं के प्रति सम्मान, जरूरतमंदों के प्रति संवेदना और समाज के प्रति जिम्मेदारी दिखाई दे।
युवा शक्ति, अब जागने और आगे बढ़ने का समय है!
हे युवा भारत! अपनी ऊर्जा को केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित मत रखो, उसे समाज और राष्ट्र के निर्माण में भी लगाओ। अपनी संस्कृति को जानो, अपने इतिहास को समझो और महापुरुषों के आदर्शों से प्रेरणा लो। आधुनिक बनो, तकनीक में आगे बढ़ो, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों को कभी मत भूलो।
इस नवरात्रि संकल्प लो कि जहाँ अन्याय दिखेगा, वहाँ सत्य के पक्ष में खड़े होंगे; जहाँ कोई असहाय होगा, वहाँ सहायता का हाथ बढ़ाएँगे; जहाँ नारी का अपमान होगा, वहाँ उसके सम्मान और सुरक्षा के लिए आवाज उठाएँगे। नफरत के स्थान पर सद्भाव, भेदभाव के स्थान पर समानता और निराशा के स्थान पर आशा का संदेश फैलाएँगे।
केवल माँ के जयकारे लगाने वाले नहीं, माँ के आदर्शों पर चलने वाले युवा बनें। केवल दीप जलाने वाले नहीं, किसी के अँधेरे जीवन में रोशनी लाने वाले बनें। केवल अपनी उन्नति के लिए नहीं, समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए भी जिएँ।
आज आवश्यकता ऐसे युवाओं की है, जो आस्था के साथ विवेक, परंपरा के साथ प्रगतिशील सोच और धार्मिक संस्कारों के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएँ। धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को बेहतर बनाना, उसके भीतर करुणा जगाना और उसे अपने कर्तव्यों के प्रति सजग करना है। जब आस्था सेवा का रूप लेती है, तभी उसका सामाजिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
नवरात्रि का पर्व हमें यह भी याद दिलाता है कि नारी शक्ति का सम्मान केवल देवी की पूजा तक सीमित नहीं रहना चाहिए। महिलाओं की शिक्षा, सुरक्षा, समान अवसर और गरिमा सुनिश्चित करना पूरे समाज की जिम्मेदारी है। माँ दुर्गा की आराधना तभी सार्थक होगी, जब उनके आदर्श हमारे व्यवहार में भी दिखाई देंगे।
किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके युवाओं के चरित्र, विचार और कर्म में निहित होती है। यदि युवा अपनी शिक्षा को सेवा, अपनी ऊर्जा को राष्ट्रनिर्माण और अपनी आस्था को मानवता के कल्याण से जोड़ दें, तो सकारात्मक परिवर्तन की मजबूत नींव रखी जा सकती है।
नवरात्रि का यह पावन पर्व युवा पीढ़ी को पुकार रहा है—अपनी जड़ों को पहचानिए, अपने कर्तव्यों को स्वीकार कीजिए और मानवता के मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़िए। सनातन संस्कृति की महानता केवल उसकी प्राचीनता में नहीं, बल्कि उन शाश्वत मूल्यों में है, जो हर पीढ़ी को सत्य, सेवा, सद्भाव और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देते हैं।
आइए, इस नवरात्रि संकल्प लें—हमारी आस्था हमारी शक्ति बनेगी, हमारे संस्कार हमारी पहचान बनेंगे और हमारे कर्म भारत के उज्ज्वल भविष्य की नींव रखेंगे।
जय माँ दुर्गा! जय माँ काली!
