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Supreme Court: मृत्युदंड पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, फांसी के मौजूदा तरीके को बदलने की याचिका खारिज

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने भारत में फांसी के जरिए मृत्युदंड दिए जाने की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मृत्युदंड को लागू करने के लिए फांसी से कम पीड़ादायक वैकल्पिक तरीके अपनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है. याचिका में मांग की गई थी कि मृत्युदंड लागू करने के लिए फांसी के बजाय ऐसा कोई वैकल्पिक तरीका अपनाया जाए, जिससे दोषी को कम पीड़ा हो और उसकी गरिमा भी सुरक्षित रहे. पीठ ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया और फांसी के जरिए मृत्युदंड दिए जाने की मौजूदा कानूनी व्यवस्था को बरकरार रखा.  सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण रास्ता खुला रखा कि यदि भविष्य में ठोस और प्रभावी चिकित्सकीय या वैज्ञानिक प्रमाण सामने आते हैं कि फांसी से अनावश्यक पीड़ा होती है या यह व्यक्ति की गरिमा के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करती है, तो इस मुद्दे की दोबारा संवैधानिक समीक्षा की जा सकती है.

अदालत ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार चाहे तो विशेषज्ञों की समिति गठित कर मृत्युदंड लागू करने के वैकल्पिक तरीकों की व्यापक समीक्षा करा सकती है. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, विशेषज्ञ समिति यह आकलन कर सकती है कि क्या कोई वैकल्पिक तरीका पीड़ा को कम करने और व्यक्ति की गरिमा बनाए रखने के संवैधानिक उद्देश्य को बेहतर ढंग से पूरा कर सकता है.  याचिकाकर्ता ने इस मुद्दे से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पहले के तीन फैसलों को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग भी की थी. हालांकि, पीठ ने कहा कि ऐसे फैसलों को बड़ी पीठ के पास भेजकर उनके बीच सामंजस्य स्थापित करने का पर्याप्त आधार नहीं बनता. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस बात से संतुष्ट नहीं है कि पुराने तीन फैसलों को बड़ी पीठ के पास भेजने के लिए मामला बनता है. पीठ ने पुराने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354 और वर्तमान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 393 के संदर्भ में भी याचिका पर विचार किया.

22 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था. यह याचिका वकील ऋषि मल्होत्रा ने दाखिल की थी, जिसमें उन्होंने फांसी को मौत की सजा देने का एक क्रूर और अमानवीय तरीका बताया है. याचिकाकर्ता ने फांसी के बजाय जहर का इंजेक्शन देने का सुझाव दिया. केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट को बताया कि इस मुद्दे पर विचार के लिए सरकार ने एक कमेटी गठित की है. वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता और केंद्र सरकार को तीन हफ्ते में अपनी लिखित दलीलें जमा करने का निर्देश दिया है.

याचिका में मृत्युदंड की प्रक्रिया को बदलने की अपील की गई

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में दायर इस याचिका में मृत्युदंड की प्रक्रिया को बदलने की अपील की गई है. 15 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने नाराज़गी जताई थी कि केंद्र सरकार इसे बदलने के लिए तैयार नहीं है. सुनवाई के दौरान यह सुझाव भी सामने आया था कि दोषी को फांसी या जहर के इंजेक्शन में से किसी एक को चुनने का विकल्प दिया जा सकता है, लेकिन केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा था कि ऐसा करना “व्यावहारिक रूप से संभव नहीं” है. इस पर अदालत ने नाराज़गी जताई थी और कहा कि केंद्र समय के साथ विकसित होने को तैयार नहीं दिख रहा. केंद्र की ओर से वरिष्ठ वकील सोनिया माथुर ने दलील दी थी कि यह मामला नीतिगत निर्णय से जुड़ा है. बुधवार की सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच ने मौखिक रूप से कहा, “समस्या यह है कि सरकार बदलने को तैयार नहीं है.” उन्होंने यह भी कहा कि यह बहुत पुरानी प्रक्रिया है और समय के साथ चीज़ें बदल गई हैं.

याचिका में क्या कहा गया है?

याचिका में फांसी की जगह जहर का इंजेक्शन, शूटिंग, इलेक्ट्रोक्यूशन या गैस चैंबर जैसे विकल्प सुझाए गए हैं, जिनसे सजायाफ्ता की मौत कुछ ही मिनटों में हो सकती है. वकील ऋषि मल्होत्रा की इस जनहित याचिका में फांसी को अत्यधिक पीड़ादायक, अमानवीय और क्रूर बताया गया है. याचिकाकर्ता ने CrPC की धारा 354(5) के तहत फांसी देकर मृत्युदंड देने को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है, साथ ही सम्मानजनक मृत्यु के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना जाए. याचिका में यह भी कहा गया है कि फांसी में मृत्यु घोषित करने में लगभग 40 मिनट लगते हैं, जबकि शूटिंग या जहर के इंजेक्शन से यह प्रक्रिया करीब 5 मिनट में पूरी हो जाती है. मल्होत्रा ने संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव का भी उल्लेख किया है जिसमें कहा गया है कि जहां मृत्युदंड दिया जाता है, वहां इसे कम से कम पीड़ा देने वाले तरीके से लागू किया जाना चाहिए.

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