नई दिल्ली। पृथ्वी की कक्षा में लगातार बढ़ रहे अंतरिक्ष मलबे से निपटने के लिए भारत ने बड़ी पहल की है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2030 तक भारतीय अंतरिक्ष गतिविधियों को ‘डेब्रिस फ्री’ बनाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए ‘स्वच्छ स्पेस मिशन’ के तहत अंतरिक्ष में मौजूद कचरे को कम करने और भविष्य में नए मलबे के निर्माण को रोकने पर काम किया जाएगा। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस महत्वाकांक्षी विजन की घोषणा की है।
इस मिशन में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के साथ निजी क्षेत्र की कंपनियां भी अहम भूमिका निभाएंगी। इसका उद्देश्य अंतरिक्ष को सुरक्षित और टिकाऊ बनाना है, ताकि भविष्य के उपग्रह अभियानों और वैज्ञानिक गतिविधियों पर मलबे का खतरा कम किया जा सके।
2030 तक अंतरिक्ष गतिविधियों को बनाएंगे मलबा मुक्त
केंद्र सरकार ने ‘डेब्रिस फ्री स्पेस मिशन’ (DFSM) के तहत 2030 तक भारतीय अंतरिक्ष अभियानों से नया मलबा पैदा होने से रोकने का लक्ष्य निर्धारित किया है। डॉ. जितेंद्र सिंह के मुताबिक, भारत अंतरिक्ष में मौजूद मलबे के खतरे को कम करने के लिए जरूरी तकनीक और क्षमताएं विकसित कर रहा है। यह पहल अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता के साथ वैश्विक अंतरिक्ष सुरक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को भी दर्शाती है।
दरअसल, पृथ्वी की कक्षा में उपग्रहों की संख्या लगातार बढ़ रही है। स्टारलिंक और वनवेब जैसे बड़े सैटेलाइट नेटवर्क ने अंतरिक्ष में गतिविधियों को पहले से अधिक बढ़ा दिया है। इसके साथ ही निष्क्रिय उपग्रहों, रॉकेट के हिस्सों और अन्य टूटे उपकरणों का मलबा भी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
अंतरिक्ष में मौजूद हैं करोड़ों मलबे के टुकड़े
अंतरिक्ष मलबे को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पृथ्वी की कक्षा में 10 करोड़ से अधिक मानव निर्मित छोटे-बड़े मलबे के टुकड़े मौजूद हैं। इनमें से कई वस्तुएं 25 हजार किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की रफ्तार से घूम रही हैं। इतनी तेज गति के कारण मलबे का छोटा-सा टुकड़ा भी किसी सक्रिय उपग्रह को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
NASA के आंकड़ों के मुताबिक, पृथ्वी की कक्षा में करीब 50 हजार बड़े ऑब्जेक्ट मौजूद हैं, जिन्हें ट्रैक किया जा सकता है। वहीं, अमेरिकी स्पेस सर्विलांस नेटवर्क ने अगस्त 2026 तक 34 हजार से अधिक वस्तुओं को सूचीबद्ध किया था। इनमें सक्रिय और निष्क्रिय उपग्रहों के साथ रॉकेट के अवशेष भी शामिल हैं।
वैश्विक अंतरिक्ष मलबे में भारत की हिस्सेदारी 1 प्रतिशत से कम
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत से संबंधित 129 ट्रैक किए जा सकने वाले मलबा ऑब्जेक्ट अंतरिक्ष में मौजूद हैं। इनमें 23 निष्क्रिय उपग्रह लो अर्थ ऑर्बिट में और 26 जियोस्टेशनरी कक्षा में हैं। इसके अलावा PSLV, GSLV और LVM3 मिशनों के 47 इस्तेमाल किए जा चुके रॉकेट चरण तथा PSLV से जुड़े 33 मलबे के टुकड़े शामिल हैं।
वैश्विक स्तर पर अंतरिक्ष मलबे का सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिका और रूस से जुड़ा है। दोनों देशों की हिस्सेदारी लगभग 70 से 80 प्रतिशत बताई जाती है। वहीं, चीन और यूरोप का योगदान भी उल्लेखनीय है। भारत का हिस्सा कुल वैश्विक मलबे में 1 प्रतिशत से कम है, लेकिन सरकार का मानना है कि कम मात्रा में मौजूद मलबा भी अंतरिक्ष अभियानों के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
ISRO ने पहले से शुरू किए कई उपाय
अंतरिक्ष को मलबा मुक्त बनाने के लिए ISRO पहले से ही कई तकनीकी उपायों पर काम कर रहा है। अब उपग्रहों को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि उनका मिशन पूरा होने के बाद उन्हें सुरक्षित तरीके से कक्षा से बाहर निकाला जा सके।
लो अर्थ ऑर्बिट में काम करने वाले उपग्रहों को मिशन समाप्त होने के बाद धीरे-धीरे नीचे लाया जाता है, जिससे वे पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर नष्ट हो सकें। हाल ही में भारत के SPaDeX मिशन के दोनों उपग्रह भी पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर नष्ट हुए थे।
इसके अलावा भारत अंतरिक्ष में मलबे की निगरानी और टकराव से बचाव के लिए NASA, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) और जापान की JAXA जैसी संस्थाओं के साथ भी सहयोग कर रहा है।
हैदराबाद की स्टार्टअप विकसित कर रही मलबा हटाने की तकनीक
इस मिशन में निजी क्षेत्र की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। हैदराबाद की स्टार्टअप कंपनी Cosmoserve Space अंतरिक्ष में उपग्रहों की सर्विसिंग, मरम्मत, ईंधन भरने और मलबा हटाने से जुड़ी तकनीक विकसित कर रही है।
कंपनी का मानना है कि भविष्य में अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था केवल नए उपग्रह लॉन्च करने तक सीमित नहीं रहेगी। पुराने उपग्रहों की मरम्मत, उनकी कार्यक्षमता बढ़ाने और निष्क्रिय उपग्रहों को कक्षा से हटाने की जरूरत भी तेजी से बढ़ेगी।
दो अंतरिक्ष यानों की मदद से होगी सर्विसिंग
Cosmoserve Space ‘ड्यूल स्पेसक्राफ्ट आर्किटेक्चर’ पर काम कर रही है। इसके तहत एक बड़ा ऑर्बिटल सर्विस स्टेशन अंतरिक्ष में ईंधन, उपकरण और जरूरी स्पेयर पार्ट्स का भंडार रखेगा। वहीं, एक छोटा स्वायत्त सर्विस वाहन अलग-अलग उपग्रहों तक पहुंचकर उनका निरीक्षण, मरम्मत, डॉकिंग और मलबा हटाने का काम करेगा।
कंपनी का दावा है कि इस तकनीक से उपग्रहों की सर्विसिंग की लागत में काफी कमी आ सकती है। मौजूदा अनुमान के मुताबिक, प्रति उपग्रह सर्विसिंग की लागत करीब 1 करोड़ डॉलर से घटकर 10 लाख डॉलर से कम हो सकती है।
स्टार्टअप ने हाल ही में 60 लाख डॉलर की सीड फंडिंग जुटाई है। इसके साथ कंपनी में कुल निवेश 90 लाख डॉलर से अधिक हो गया है।
कंपनी के संस्थापक और CEO डॉ. चिरंजीवी फणिंद्र के मुताबिक, अंतरिक्ष मलबा अब दुनिया के सभी देशों के अंतरिक्ष अभियानों के सामने बड़ी चुनौती बन चुका है। हैदराबाद में स्थापित नया केंद्र गगनयान, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और भविष्य के उपग्रह अभियानों के लिए अंतरिक्ष कक्षाओं को सुरक्षित रखने में योगदान देगा।
NETRA और IS4OM से मजबूत होगी अंतरिक्ष निगरानी
भारत अंतरिक्ष में मौजूद वस्तुओं पर नजर रखने के लिए NETRA कार्यक्रम के तहत निगरानी प्रणाली विकसित कर रहा है। 509 करोड़ रुपये की लागत वाले इस कार्यक्रम का उद्देश्य अंतरिक्ष में वस्तुओं की स्थिति पर नजर रखना, संभावित टकराव का आकलन करना और उपग्रहों को सुरक्षित रखना है।
इसके अलावा ISRO ने वर्ष 2022 में IS4OM (ISRO System for Safe and Sustainable Space Operations Management) की स्थापना की थी। यह प्रणाली अंतरिक्ष अभियानों की सुरक्षा और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में काम करती है।
14.5 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है बाजार
विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक, उपग्रह सर्विसिंग और अंतरिक्ष मलबा हटाने का वैश्विक बाजार वर्ष 2030 तक 14.5 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। ऐसे में भारत का स्वच्छ स्पेस मिशन न केवल अंतरिक्ष सुरक्षा के लिहाज से अहम है, बल्कि देश के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए भी नए अवसर पैदा कर सकता है।
स्टारलिंक और वनवेब जैसे सैटेलाइट नेटवर्क के विस्तार के बीच अंतरिक्ष में बढ़ती भीड़ को नियंत्रित करना जरूरी हो गया है। ऐसे में भारत की यह पहल भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों को सुरक्षित, व्यवस्थित और टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
