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आजम खान और बेटे अब्दुल्ला पैन कार्ड मामले में दोषी करार, कोर्ट ने सुनाई 7-7 साल की सजा

PAN Card Case: समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान की मुश्किले कम होने का नाम नहीं ले रही है। आजम खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम खान दो पैन कोड मामले में दोषी पाए गए हैं।

PAN Card Case: समाजवादी पार्टी (सपा) के वरिष्ठ नेता आजम खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम खान को दोहरे पैन कार्ड मामले में रामपुर की एमपी/एमएलए विशेष अदालत ने सोमवार को दोषी ठहराते हुए सात-सात साल की सजा सुनाई। अदालत ने दोनों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। यह फैसला 2019 में दायर शिकायत पर आधारित है, जिसमें भाजपा नेता आकाश सक्सेना ने अब्दुल्ला पर दो अलग-अलग जन्मतिथि वाले पैन कार्ड बनाने का आरोप लगाया था।

PAN Card Case: पिता के साथ मिलकर बनवाए थे जाली दस्तावेज

सपा के लिए यह झटका तब लगा है जब आजम खान को सितंबर 2025 में जमानत मिलने के महज दो महीने बाद यह सजा आई। अदालत ने कहा कि अब्दुल्ला ने पिता के साथ मिलकर जाली दस्तावेज बनवाए, जो 2017 के विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए इस्तेमाल हुए।

PAN Card Case: 2017 चुनाव से जुड़ा फर्जीवाड़ा

यह मामला 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से जुड़ा है। अब्दुल्ला आजम ने स्वार सीट से चुनाव लड़ा, जहां उन्हें 25 वर्ष की न्यूनतम आयु पूरी करने के लिए जन्मतिथि में छेड़छाड़ का आरोप लगा। एक पैन कार्ड में उनकी जन्मतिथि 1 जनवरी 1993 दर्ज थी, जबकि दूसरे में 30 सितंबर 1990। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि आजम खान ने बेटे के साथ साजिश रचकर बैंक रिकॉर्ड और आयकर दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा किया।

PAN Card Case: इन धाराओं में दर्ज हुआ मुकदमा

रामपुर के सिविल लाइंस थाने में 30 जुलाई 2019 को भाजपा नेता आकाश सक्सेना ने आईपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (मूल्यवान सुरक्षा की जालसाजी), 468 (धोखे के लिए जालसाजी), 471 (जाली दस्तावेज का उपयोग) और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत मुकदमा दर्ज कराया। जांच के बाद रामपुर पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की, जिसमें आजम खान को सह-आरोपी नामित किया गया।

PAN Card Case: रामपुर की विशेष अदालत ने सुनाई सजा

ट्रायल के दौरान अदालत ने गवाहों के बयान, बैंक रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच की। विशेष लोक अभियोजक संदीप सक्सेना ने बताया कि अदालत ने पाया कि अब्दुल्ला ने पिता की साजिश में फर्जी पैन कार्ड बनवाया और आधिकारिक रिकॉर्ड में जमा किया। फैसले के बाद दोनों को हिरासत में ले लिया गया। वकील ने रामपुर जेल में पिता-पुत्र को एक साथ रखने की याचिका दाखिल की है।

कानूनी लड़ाई: हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से झटके

इस मामले में अब्दुल्ला आजम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रायल रद्द करने की याचिका दायर की थी, लेकिन जुलाई 2025 में कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। जस्टिस ने कहा, ‘ट्रायल कोर्ट पर भरोसा करें, मामले को तय होने दें।’ अब्दुल्ला ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां जस्टिस सुंदरेश ने राहत से इनकार करते हुए दोहराया कि ट्रायल पूरा होने के बाद हस्तक्षेप नहीं हो सकता।

इस महीने की शुरुआत में अब्दुल्ला को पासपोर्ट मामले में भी झटका लगा। सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी दस्तावेजों से पासपोर्ट हासिल करने की एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया। जस्टिस ने कहा, ‘ट्रायल कोर्ट पर यकीन कीजिए।’ यह मामला भी 2019 का है, जिसमें गलत जन्मतिथि का इस्तेमाल हुआ।

एक राहत भी: भड़काऊ भाषण मामले में बरी

हालांकि, पिछले हफ्ते आजम खान को एक मामले में राहत मिली। 2019 लोकसभा चुनाव में तत्कालीन एसडीएम पीपी तिवारी द्वारा दर्ज भड़काऊ भाषण के केस में लखनऊ कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि पुलिस ने पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं किए। यह मामला सपा सरकार के मंत्री काल में भाजपा और आरएसएस के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़ा था। बरी होने के बावजूद, अन्य लंबित मामलों के कारण आजम खान चुनाव लड़ने के अयोग्य बने रहेंगे।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: सपा का आरोप, भाजपा का स्वागत

सपा ने फैसले को ‘राजनीतिक साजिश’ बताया। पार्टी प्रवक्ता ने कहा, ‘यह भाजपा का बदला है; आजम खान मुस्लिम समाज की आवाज हैं।’ सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने ट्वीट किया, ‘न्याय व्यवस्था पर सवाल।’ वहीं, भाजपा ने इसे ‘कानून की जीत’ कहा। आकाश सक्सेना ने कहा, ‘फर्जीवाड़े का अंत हुआ।’ रामपुर में सपा समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन किया, लेकिन पुलिस ने नियंत्रण कर लिया।

100 से अधिक मुकदमे लंबित

आजम खान पर 100 से अधिक मुकदमे लंबित हैं। वे सितंबर में सीतापुर जेल से रिहा हुए थे, जबकि अब्दुल्ला अप्रैल में हरदोई जेल से बाहर आए। नई सजा से उन्हें फिर जेल जाना पड़ेगा। वकील अपील की तैयारी कर रहे हैं, जो इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सजा सपा की रामपुर इकाई को कमजोर करेगी, खासकर 2027 विधानसभा चुनाव से पहले। कुल मिलाकर, खान परिवार की कानूनी लड़ाई लंबी चलने वाली है, लेकिन राजनीतिक प्रभाव बरकरार रहेगा।

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