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Waqf Case: सुप्रीम कोर्ट की केंद्र से तीखी पूछताछ- ‘क्या मुस्लिमों को हिंदू ट्रस्ट में शामिल करेंगे?’

Waqf Case: वक्फ संशोधन अधिनियम-2025 की वैधता को चुनौती देने वाली 73 याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में आज की सुनवाई पूरी हो गई है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केंद्र सरकार से कई तीखे सवाल पूछे।

Waqf Case: वक्फ संशोधन अधिनियम-2025 की वैधता को चुनौती देने वाली 73 याचिकाओं पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की गैरहाजिरी में जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने केंद्र सरकार से कई तीखे सवाल पूछे। कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि यदि वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों को शामिल किया जा सकता है, तो क्या सरकार मुस्लिमों को हिंदू धार्मिक ट्रस्टों में भी जगह देगी? कोर्ट ने यह सवाल धार्मिक ट्रस्टों और बोर्डों की स्वायत्तता और धर्मनिरपेक्ष प्रशासन को लेकर उठाया।

Waqf Case: सुप्रीम कोर्ट का तीखा सवाल

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि मुसलमानों का एक बड़ा तबका वक्फ अधिनियम के अधीन नहीं आना चाहता। इस पर CJI संजीव खन्ना ने स्पष्ट और तीखे लहजे में सवाल किया – क्या अब मुसलमानों को भी हिंदू ट्रस्टों का हिस्सा बनाया जाएगा? क्या आप यह कहने जा रहे हैं? कोर्ट ने आगे कहा कि यदि कोई सार्वजनिक संपत्ति 100 या 200 साल पहले वक्फ घोषित की गई हो, तो क्या उसे आज अचानक बोर्ड द्वारा हथिया लेना उचित है? आप इतिहास को फिर से नहीं लिख सकते, कोर्ट ने दो टूक कहा।

Waqf Case: याचिकाओं का आधार क्या है?

अधिवक्ता कपिल सिब्बल और राजीव धवन की अगुवाई में याचिकाकर्ताओं ने वक्फ संशोधन अधिनियम-2025 को संविधान के अनुच्छेद 26 का उल्लंघन बताया। उनका कहना है कि यह अनुच्छेद प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है। सिब्बल ने कहा कि अधिनियम न केवल धार्मिक स्वतंत्रता का हनन करता है, बल्कि मुस्लिम समुदाय की निजी संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण का रास्ता भी खोलता है।

उन्होंने अधिनियम की कई धाराओं को असंवैधानिक करार दिया, खासतौर पर धारा 3(आर), 3(ए)(2), 3(सी), 3(ई), 9, 14 और 36, जो मुस्लिमों के धार्मिक और संपत्ति संबंधी अधिकारों को प्रभावित करती हैं।

Waqf Case: कोर्ट ने क्या रुख अपनाया?

सीजेआई संजीव खन्ना ने यह स्पष्ट किया कि सभी याचिकाकर्ताओं को बोलने की अनुमति नहीं दी जाएगी। केवल चुने हुए वकील ही बहस करेंगे और तर्क दोहराए नहीं जाएंगे। कोर्ट ने अनुच्छेद 26 की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति पर जोर देते हुए कहा कि यह सभी समुदायों पर समान रूप से लागू होता है।

जस्टिस विश्वनाथन ने टिप्पणी की कि संपत्ति धर्मनिरपेक्ष हो सकती है, जबकि उसका प्रशासन धार्मिक हो सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह इस चरण में कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं कर रही है, लेकिन वह कुछ सीमित मुद्दों पर आदेश जारी कर सकती है।

Waqf Case: केंद्र सरकार का पक्ष

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि वक्फ कानून का उद्देश्य केवल संपत्ति का प्रबंधन है, न कि धार्मिक गतिविधियों में हस्तक्षेप। उन्होंने कहा कि कलेक्टर को वक्फ संपत्तियों पर त्वरित निर्णय लेने का अधिकार देकर न्यायिक प्रक्रिया को आसान किया गया है।

उन्होंने यह भी बताया कि 1995 से 2013 तक वक्फ बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार करती रही है। वक्फ न्यायाधिकरण न्यायिक निकाय है और इसके निर्णयों पर न्यायिक समीक्षा संभव है।

कोर्ट की अंतरिम व्यवस्था का प्रस्ताव

सुप्रीम कोर्ट ने एक संभावित अंतरिम व्यवस्था पर विचार करते हुए कहा कि वक्फ बाय यूजर या अन्य किसी रूप से घोषित संपत्ति को फिलहाल ‘गैर-अधिसूचित’ नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि कलेक्टर की कार्रवाई जारी रह सकती है, लेकिन अधिनियम की विवादित धाराएं लागू नहीं होंगी। पदेन सदस्यों की नियुक्ति धर्म के आधार पर नहीं की जाएगी, लेकिन वे मुस्लिम समुदाय से होंगे।

केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए मामले की पूरी सुनवाई की मांग की। अब इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट के तीखे सवालों और केंद्र के रुख से यह साफ है कि यह मामला केवल धार्मिक संपत्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे और संविधान के मूल अधिकारों की व्याख्या से भी जुड़ा हुआ है।

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