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Monday, September 14, 2026
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टाइफाइड पर WHO की नई गाइडलाइन! जानिए पुरानी एंटीबायोटिक दवाएं क्यों हो रही हैं बेअसर, वैक्सीन क्यों जरूरी?

मौसम बदलते ही या बाहर का कुछ उल्टा सीधा खाते ही हमारे यहां सबसे पहले जिस बीमारी का डर सताता है, वो है टाइफाइडकई बार तो हफ्तों तक तेज बुखार टूटता ही नहीं और इंसान बिस्तर पकड़ लेता हैइसी गंभीर बीमारी से निपटने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO ने अपनी ताजा गाइडलाइन जारी कर दी है. दरअसल 2018 के बाद से अब तक दवाओं और टीकों को लेकर जमीन पर बहुत कुछ बदल चुका है. बैक्टीरिया पर पुरानी दवाओं का असर कम हो रहा है और नए टीकों के कई बड़े नतीजे सामने आए हैं. इसलिए पुरानी नीतियों को बदलते हुए WHO ने साफ कर दिया है कि अब लड़ाई का तरीका बदलना पड़ेगा.

बीमारी कैसे फैलती है और इसका जाल कितना बड़ा है

टाइफाइड कोई आम वायरल बुखार नहीं है, बल्कि यह साल्मोनेला टाइफी नाम के बैक्टीरिया से फैलने वाला एक खतरनाक इन्फेक्शन हैयह बीमारी सीधे तौर पर हमारी रोजमर्रा की साफ सफाई और खान पान से जुड़ी हुई है.

  • गंदा या बिना उबला पानी पीने और खुले में बिकने वाला दूषित खाना खाने से बैक्टीरिया पेट में पहुंच जाता है.
  • इस बीमारी में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो खुद तो पूरी तरह ठीक दिखते हैं, लेकिन उनके शरीर में बैक्टीरिया जिंदा रहता हैइन्हें क्रोनिक कैरियर कहते हैं, जो जाने अनजाने सालों तक दूसरों को बीमार करते रहते हैं.
  • एक अनुमान के मुताबिक अकेले साल 2023 में दुनिया भर में करीब 62 लाख लोग इस बुखार की चपेट में आए और 70 हजार से ज्यादा लोगों की जान चली गई.
  • इसका सबसे ज्यादा कहर भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया और अफ्रीका के गरीब इलाकों में देखने को मिलता है, जहां बच्चों पर सबसे ज्यादा मार पड़ती है.

टाइफाइड की 3 प्रमुख वैक्सीन

वैक्सीनउम्रविशेषता
TCV6 महीने+लंबे समय तक सुरक्षा
Vi Polysaccharide2 साल+बूस्टर की जरूरत पड़ सकती है
Ty21a6 साल+ओरल कैप्सूल, सभी के लिए उपयुक्त नहीं

लक्षण दिखने में आम हैं पर अनदेखी जानलेवा

जब यह बैक्टीरिया आंतों के जरिए खून में पहुंचता है, तो आम तौर पर एक से दो हफ्ते के अंदर मरीज की हालत बिगड़ने लगती है.

  • लगातार तेज बुखार चढ़ना जो आसानी से नहीं उतरता.
  • पेट में मरोड़ उठना, भारी दर्द और भयंकर कमजोरी महसूस होना.
  • तेज सिरदर्द के साथ साथ उल्टी, दस्त या फिर पेट का एकदम जाम हो जाना.

अगर वक्त रहते सही इलाज न मिले तो आंतों में घाव बन जाते हैं, खून बहने लगता है और कई बार आंत फटने की नौबत आ जाती है, जो सीधे जान पर बन आती है.

दवाएं क्यों हो रही हैं बेअसर

इस समय डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह आ रही है कि टाइफाइड का बैक्टीरिया अब बहुत ढीठ हो चुका हैजिन पुरानी एंटीबायोटिक दवाओं से मरीज दो दिन में उठकर खड़ा हो जाता था, वे अब कई मरीजों पर बेअसर साबित हो रही हैं.

  • दक्षिण एशिया के देशों में मल्टीड्रग रेजिस्टेंट और एक्सडीआर बैक्टीरिया बहुत तेजी से फैला है.
  • कई मामलों में तो नई और महंगी दवाएं भी काम नहीं कर पा रही हैं.

इसी खतरे को देखते हुए WHO का कहना है कि सिर्फ गोलियों और सीरप के भरोसे बैठने के बजाय वैक्सीन लगवाना अब सबसे ज्यादा महत्वपुर्ण हो गया है.

कौन सी वैक्सीन है सबसे बेहतर

बाजार में वैसे तो तीन तरह के टीके उपलब्ध हैं, लेकिन WHO ने अपनी रिपोर्ट में टीसीवी यानी टाइफाइड कंजुगेट वैक्सीन को सबसे आगे रखा है.

टीसीवी वैक्सीन: यह आज के समय का सबसे आधुनिक टीका हैइसे एक खास प्रोटीन के साथ तैयार किया जाता है, जिससे यह 6 महीने के छोटे बच्चों से लेकर 45 से 65 साल तक के वयस्कों में भी जबरदस्त इम्युनिटी बनाता है.
वीआई पॉलीसैकराइड वैक्सीन: यह इंजेक्शन 2 साल से बड़े बच्चों को दिया जाता है, मगर दिक्कत यह है कि दो तीन साल बाद इसका असर खत्म होने लगता है और दोबारा सुई लगवानी पड़ती है.
टीवाई21ए कैप्सूल: यह मुंह से खाने वाली दवा है जो 6 साल से बड़े बच्चों को दी जाती है, लेकिन कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों और गर्भवती महिलाओं को यह नहीं दी जा सकती.

रिसर्च के नए आंकड़े क्या कहते हैं

नेपाल, बांग्लादेश और मलावी जैसे देशों में लाखों बच्चों पर टीसीवी वैक्सीन के बड़े ट्रायल किए गएइन स्टडीज से कई बेहद काम की बातें सामने आई हैं.

  • यह नया टीका टाइफाइड से बचाने में 80 से 85 फीसदी तक कामयाब पाया गया है.
  • जिन बच्चों को थोड़ी बड़ी उम्र यानी 5 साल के आसपास टीका लगा, उनमें इसकी सुरक्षा कई सालों तक बहुत मजबूत बनी रही.
  • छोटे बच्चों में कुछ सालों बाद इम्युनिटी थोड़ी कम जरूर होती है, लेकिन फिर भी यह गंभीर खतरे से बचाए रखती है.

सुरक्षा के मामले में भी यह पूरी तरह खरी उतरी हैलाखों लोगों के डेटा की जांच के बाद पाया गया कि इससे कोई बड़ा खतरा नहीं है, बस हल्का दर्द या सामान्य बुखार ही देखने को मिलता है जो अपने आप ठीक हो जाता है.

बच्चों को बाकी टीकों के साथ देने की सुविधा

माता पिता को अक्सर चिंता रहती है कि क्या टाइफाइड का टीका बाकी रूटीन टीकों के साथ लगवाया जा सकता हैरिपोर्ट में साफ कहा गया है कि:

  • टीसीवी को खसरे यानी मीजल्स रूबेला के टीके के साथ एक ही दिन लगवाया जा सकता है, इससे कोई नुकसान नहीं होता.
  • एचआईवी से जूझ रहे बच्चों या कमजोर बच्चों के लिए भी यह सुरक्षित है, हालांकि ऐसे मामलों में डॉक्टरों की देखरेख जरूरी होती है.
  • अगर किसी महिला को प्रेगनेंसी के दौरान अनजाने में यह टीका लग गया हो, तो भी बच्चे पर इसका कोई बुरा असर नहीं देखा गया है.

WHO का देशों को सीधा संदेश

इस पूरे पेपर का निचोड़ यही है कि अगर टाइफाइड को हराना है, तो देशों को अपनी टीकाकरण नीति में टीसीवी को अनिवार्य रूप से जोड़ना होगा.

  • जहां टाइफाइड के मरीज बहुत ज्यादा आते हैं, वहां 9 महीने की उम्र से ही बच्चों को यह टीका लगना चाहिए और 15 साल तक के सभी बच्चों के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलना चाहिए.
  • जरूरत पड़ने पर कुछ सालों बाद बूस्टर डोज दी जा सकती है ताकि शरीर का रक्षा कवच कभी कमजोर न पड़े.
  • इसके साथ ही साफ पानी, सीवर की सही व्यवस्था और खाने पीने की दुकानों पर हाइजीन का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है.

देखा जाए तो टाइफाइड जैसी सदियों पुरानी बीमारी से बचने के लिए अब हमारे पास बेहतर और पुख्ता हथियार मौजूद हैंबस जरूरत इस बात की है कि लोग सही समय पर लक्षण पहचानें, बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी एंटीबायोटिक खाने से बचें और अपने बच्चों को समय पर टीका जरूर लगवाएं.

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