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Sunday, July 12, 2026
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पंडवानी ने बदली किस्मत, लेकिन टूट गई शादी! जानिए तीजनबाई के संघर्ष से सम्मान तक का सफर

महज 13 साल की उम्र में मंच पर पहली प्रस्तुति देने वाली तीजन बाई 70 साल की उम्र में पांच जुलाई 2026 को हमेशा के लिये खामोश हो गईं। उनके निधन से छत्तीसगढ़ समेत पूरे देश में शोक की लहर है। पीएम नरेंद्र मोदी और प्रदेश के मुखिया सीएम विष्णुदेव साय ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है। पंडवानी गायन शैली से देश-विदेश में छत्तीसगढ़ को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली मशहूर गायिका तीजनबाई की गायिका से प्रभावित होकर देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि आप बहुत शानदार महाभारत कथा सुनाती हैं। इस पर तीजन ने तपाक से जवाब देते हुए कहा था कि ‘मैं महाभारत नहीं करती पर महाभारत की कथा सुनाती हूं’।

समाज और परिवार ने किया विरोध
पंडवानी गाने की वजह से उन्हें अपने पति तक को छोड़ना पड़ा। एक महिला की ओर से इस गायनशैली में महाभारत की कथा सुनाने की वजह से उन्हें लोगों के अनगिनत ताने सुनने पड़े। समाज और परिवार ने उनका काफी विरोध किया। उन्हें अपने ही घर में विरोध का सामना करना पड़ा। उन्हें घर से निकाल दिया गया। पंडवानी की वज़ह से पहली शादी भी टूट गई। इतना ही नहीं दूसरी शादी भी पंडवानी के कारण टूटने की कगार पर थी। इसके बाद भी उन्होंने पंडवानी नहीं छोड़ी। पंडवानी उनके रग-रग में था। वो जीवनभर पंडवानी के लिये जीती रहीं या कहें कि पंडवानी और तीजनबाई एक दूसरे के पूरक हैं, तो इसमें कोई अतिसंयोक्ति नहीं होगी।

पति को बोलीं- आज से तुम मेरे कोई नहीं
एक बार छत्तीसगढ़ में मंच पर तीजन बाई पंडवानी गा रही थी, तो उनके पति ने गुस्सा होकर अभद्र भाषा में बोलते हुए कड़ा एतराज जताया इस पर तीजन ने तंबूरा उठाकर जोर से कहा कि तुमने सिर्फ मेरा नहीं बल्कि मेरी कला और मंच का भी अपमान किया है। इसलिए अब तम माफी के योग्य नहीं हो। आज से तुम मेरे कोई नहीं हो।

प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर ने दिया सम्मान
प्रदेश के प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उनका सम्मान किया। उन्हें भोपाल के भारत भवन से पंडवानी गाने का न्यौता दिया। यहीं पर उनकी मुलाकात तनवीर से हुई थी। तनवीर उनके गायन, गर्जन और अभिनय से प्रभावित होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने पंडवानी गाने का मौका दिलवाया।

‘भारत एक खोज’ में मिला मौका
इतनी ही नहीं प्रसिद्ध निर्देशक श्याम बेनेगल भी उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें अपने धारावाहिक ‘भारत एक खोज’ में महाभारत प्रसंग के लिए आमंत्रित किया। इस तरह से उनकी कला घर-घर तक पहुंचीं। भिलाई स्टील प्लांट ने उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें साल 1986 में नौकरी दी।

13 साल की उम्र में पहली प्रस्तुति
13 साल की उम्र में तीजन बाई ने पंडवानी की पहली प्रस्तुति चंदखुरी गांव के सतीचौरा चौक पर दी। यहां पर गाने की वजह से आस-पास के गांवों में भी उनकी पहचान बनी। भिलाई में एक कार्यक्रम में पहली बार शहर में गाने का मौका मिला। फिर भोपाल, दुर्ग, रायपुर समेत विश्व में अपनी कला का लोहा मनवाया। तीजन बाई को वाद्ययंत्रों के साथ पंडवानी गाने का कौशल उमेद सिंह देशमुख ने सिखाया। तीजन बाई उन्हें गुरु मानती रहीं। उन्हें प्रेम से वो ‘ददा’ कहती थीं।

गरीब परिवार से निकलकर विश्व मंच तक का सफर
24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। उनके पिता का नाम हुकुमचंद परधा और माता का नाम सुखवती बाई था। बचपन से ही उन्हें महाभारत की कथाओं और पंडवानी गायन में गहरी रुचि थी। उनके नाना ब्रजलाल परधा से उन्हें इस लोककला की प्रारंभिक शिक्षा मिली।

17 से अधिक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति
उन्होंने इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, तुर्की, मॉरीशस, जापान सहित 17 से अधिक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति का विश्वभर में परचम लहराया। उनकी प्रभावशाली आवाज, अभिनय और कथावाचन शैली ने विदेशी दर्शकों को भी भारतीय लोक परंपरा से परिचित कराया।

देश-विदेश में मिले अनेक प्रतिष्ठित सम्मान
लोककला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया। वर्ष 1988 में पद्मश्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2003 में पद्म भूषण, 2018 में जापान का प्रतिष्ठित फुकुओका पुरस्कार तथा 2019 में भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त बिलासपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. (मानद उपाधि) प्रदान कर सम्मानित किया।

पद्म विभूषण से सम्मानित छत्तीसगढ़ की पहली महिला 
वो छत्तीसगढ़ की पहली महिला कलाकार थीं, जिन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित मिला था। उन्होंने देश-विदेश के मंच पर अपनी कला का शानदार प्रदर्शन किया। कई देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को देश-दुनिया में स्थापित किया।

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