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भारत में खेती हो रही जहरीली, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में टॉप 6 देशों में शामिल; नई स्टडी ने दी चेतावनी

नई दिल्ली: कृषि को हमेशा जीवनदायिनी माना जाता है, लेकिन एक नई अंतरराष्ट्रीय स्टडी ने चेतावनी दी है कि यही खेती धीरे-धीरे पृथ्वी के लिए खतरा बनती जा रही है. ‘नेचर क्लाइमेट चेंज’ जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक, दुनिया में खेती से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों का सबसे बड़ा स्रोत सिर्फ छह देश हैं चीन, इंडोनेशिया, भारत, अमेरिका, थाईलैंड और ब्राजील. कुल वैश्विक कृषि प्रदूषण का 61% हिस्सा अकेले इन्हीं देशों से आता है.

यह पहली बार है जब वैज्ञानिकों ने एक विस्तृत ग्लोबल मैप तैयार किया है जो दिखाता है कि किस फसल, किस क्षेत्र और किन तरीकों से सबसे ज्यादा प्रदूषण हो रहा है. यह मैप न सिर्फ उत्सर्जन के स्रोतों की पहचान करता है, बल्कि यह भी बताता है कि इन्हें नियंत्रित करने के लिए किस स्तर पर बदलाव की जरूरत है.

राइस प्रोडक्शन की है बड़ी भूमिका

रिपोर्ट के सबसे चौंकाने वाले निष्कर्षों में एक है चावल यानी राइस प्रोडक्शन की भूमिका. अध्ययन के अनुसार, केवल धान की खेती ही दुनिया के कुल कृषि उत्सर्जन में 43% योगदान देती है. धान के खेतों में पानी भरे रहने से मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है, जो कार्बन डाइऑक्साइड से कहीं ज्यादा खतरनाक ग्रीनहाउस गैस मानी जाती है.

भारत की स्थिति इस संदर्भ में बेहद अहम है. दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक देशों में शामिल भारत में धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है. पानी से भरे खेतों में मीथेन का लगातार उत्सर्जन, साथ ही उर्वरकों का अत्यधिक इस्तेमाल, देश को उच्च उत्सर्जक प्रोफाइल वाले देशों की सूची में खड़ा करता है. अध्ययन के अनुसार, भारत में नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का उपयोग पिछले दो दशकों में कई गुना बढ़ चुका है, जिससे नाइट्रस ऑक्साइड जैसी खतरनाक गैसों का उत्सर्जन तेजी से बढ़ा है.

रिपोर्ट का दूसरा बड़ा निष्कर्ष कृषि अपशिष्ट जलाने (Crop Residue Burning) से जुड़े उत्सर्जन का है. भारत और इंडोनेशिया में धान और गेहूं के अवशेष जलाने से बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें और जहरीले कण वायुमंडल में फैलते हैं. यह न सिर्फ जलवायु को नुकसान पहुंचाता है बल्कि वायु प्रदूषण को भी खतरनाक स्तर पर ले जाता है.

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत जैसे देशों में कृषि सुधारों को तेजी से लागू किया जाए, किसानों को तकनीकी सहायता दी जाए और फसल चक्र में विविधता को बढ़ावा दिया जाए, तो उत्सर्जन को काफी कम किया जा सकता है. लेकिन इसके लिए नीति स्तर पर मजबूत फैसलों की जरूरत है. अध्ययन स्पष्ट संकेत देता है खेती को बचाना है तो इसे आधुनिक और टिकाऊ बनाना ही होगा.

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